Him sanskriti
शिव-तत्व को नंदी की कृपा के बिना नहीं समझा जा सकता। वह शिवमंडली के प्रमुख पार्षद हैं और सदैव शिव की सेवा में तत्पर रहते हैं। संभवतः इसी कारण वह शिव के सबसे बड़े कृपापात्र भी हैं। पुराणों की एक कथा के अनुसार शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे, अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान मांगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की मांग की। भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चले गए और घोर-तपस्या करने लगे। वन में उन्होंने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- ‘वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।’भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहां पर नंदी का निवास होगा वहां उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है। शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन हैं। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देते हैं कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहां शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हंस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे। नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला भी है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है-
आनंददाता हैं नंदी
नंदी शिव के वाहन हैं और शिव के पार्षदों में उनका प्रमुख स्थान है। प्रत्येक शिव मंदिर में उनकी उपस्थिति होती है। उनका मुख सदैव भगवान शिव की ओर होता है। वह अगाध श्रद्धा और निश्छल भक्ति के प्रतीक हैं। माना जाता है कि शिव तक प्रार्थनाएं और याचनाएं नंदी के जरिए ही पहुंचती हैं। नंदी का मानवीय रूप में भी पूजन किया जाता है। वह नंदिकेश्वर के रूप में भी पूजे जाते हैं। नंदी का मतलब ही आनंददाता होता है। शिव की कृपा नंदीकेश्वर के अनुग्रह के बिना नहीं मिलती…
शिव-तत्व को नंदी की कृपा के बिना नहीं समझा जा सकता। वह शिवमंडली के प्रमुख पार्षद हैं और सदैव शिव की सेवा में तत्पर रहते हैं। संभवतः इसी कारण वह शिव के सबसे बड़े कृपापात्र भी हैं। पुराणों की एक कथा के अनुसार शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे, अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान मांगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की मांग की। भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चले गए और घोर-तपस्या करने लगे। वन में उन्होंने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- ‘वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।’भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहां पर नंदी का निवास होगा वहां उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है। शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन हैं। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिए। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देते हैं कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहां शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हंस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे। नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला भी है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है-
त्वायाहं नंदितो यस्मान्नदीनान्म सुरेश्वर।
तस्मात् त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम।।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 6/45
अर्थात नंदी के दिव्य स्वरूप को देख शिलाद मुनि ने कहा तुमने प्रगट होकर मुझे आनंदित किया है। अतःमैं आनंदमय जगदीश्वर को प्रणाम करता हूं। सभी शिव मंदिरों में नंदी उपस्थित रहते हैं और उनका मुख सदैव भगवान शिव की तरफ होता है। हां, नासिक शहर में इसका एक अपवाद मिलता है। नासिक शहर के प्रसिद्ध पंचवटी स्थल में गोदावरी तट के पास एक ऐसा शिवमंदिर है जिसमें नंदी नहीं है। अपनी तरह का यह एक अकेला शिवमंदिर है। पुराणों में कहा गया है कि कपालेश्वर महादेव मंदिर नामक इस स्थल पर किसी समय में भगवान शिवजी ने निवास किया था। यहां नंदी के अभाव की कहानी भी बड़ी रोचक है। यह उस समय की बात है जब ब्रह्मदेव के पांच मुख थे। चार मुख वेदोच्चारण करते थे, और पांचवां निंदा करता था। उस निंदा से संतप्त शिवजी ने उस मुख को काट डाला। इस घटना के कारण शिव जी को ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी ब्रह्मांड में हर जगह घूमे लेकिन उन्हें मुक्ति का उपाय नहीं मिला। एक दिन जब वे सोमेश्वर में बैठे थे, तब एक बछड़े द्वारा उन्हें इस पाप से मुक्ति का उपाय बताया गया। कथा में बताया गया है कि यह बछड़ा नंदी था। वह शिव जी के साथ गोदावरी के रामकुंड तक गया और कुंड में स्नान करने को कहा। स्नान के बाद शिव जी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो सके। नंदी के कारण ही शिवजी की ब्रह्म हत्या से मुक्ति हुई थी। इसलिए उन्होंने नंदी को गुरु माना और अपने सामने बैठने को मना किया। शिव इस सकल सृष्टि के लिए कल्याणकारी तत्व हैं और नंदी उस कल्याणकारी स्रोत को भक्तों के द्वार तक पहुंचाते हैं।

Celebrities from across the world are attrcated towards Himachal that has been bestowed with immense beauty and picturesque loactions. Many of them have chosen their life partners hailing from this hillystate. However, the latest to join the list is Arpita Khan, the youngest sister of Bollywood actor Salman Khan, who tied the nupital knot with Ayush Sharma, grandson of former Union Minister Sukh Ram and son of Himachal cabinet Minister Anil Sharma. The marriage ceremony was solemnised at picturesque Falaknuma Palace in Hyderabad on November 18 that hogged the limelight not only of the media and Bollywood industry but also of the entire country. Earlier also celebrities have established their connection with Himachal. These include personalities from royal families, Bollywood and other famous personalities.
Salman Khan’s sister Arpita Khan and Himachal Cabinet Minister Anil Sharma’s son Ayush tied the nupital knot at a lavish ceremony organised at Falaknuma Palace in Hydrabad on November 18. With this marriage, Mandi town of Himachal has established celebrity connection with Bollywood’s Dabangg actor Salman Khan. The marriage was solemnised according to Hindu traditions. Those present on the occasion included Ayush Sharma’s father and Himachal Cabinet Minister Anil Sharma, mother Sunita and elder brother Ashreya and grandfather and former Union Minister Sukh Ram whereas entire Khan family and Bollywoood’s who is who were present to shower their blessings on the couple. Nearly 400 persons attended the occasion.
Former Union Minister Sukh Ram also danced along with his family members and baratis on the occasion. The post-wedding party of Salman Khan’s sister Arpita, was full of Bollywood-style ‘naach gaana.’ The picturesque Falaknuma Palace turned into a Bollywood studio.
The occasion also brought Bollywood’s two Khans, Salman Khan and Shah Rukh Khan closer much to the delight of their fans. Shah Rukh Khan reached Slaman Khan’s Galaxy Apartment to shower blessing and both of them hugged Arpita together.





Fairs and festivals are still a very important part of Himachali people’s lives. These fairs and festivals always keep us in touch with our culture and moral values. Perhaps fairs originated for the cultural exchange and we are still following the traditions of organising traditional fairs. However, a lot of things have changed in the recent past as we started following the western culture to celebrate fairs and festivals. However, we can say that these fairs always keep us all in touch with each other and are very important for cultural exchange. Many state, national and international level fairs and festival are organised in the state, including Hamir Fest, Sombhadra Fest and Lavi International festival.
The state level Sombhadra organised at Indira Gandhi Stadium, Una concluded with much fanfare. Miss Pooja was the star attraction during the last cultural night of the fair. The three-daylong fair attracted locals as well as tourists towards the star nights of the fair which included performances by various Himachali and Punjabi singers and dancers. Famous Sufi singer Sarabjeet Cheema created a mesmerizing atmosphere on the first day of the fair. Master Saleem, a renowned name in Punjabi and Bollywood industry, performed during the fair which left the audience spell-bound.
The knowledgeable audience present in Tanda medical College auditorium stood witness to the musical evening of ‘Himachal Ki Awaz-3′ grand finale to select Himachal’s singing star of 2014. The finalists performed one after the other during the final competition before the elite panel of judges, including famous Bollywood music director Lalit Pandit. ‘Himachal Ki Awaz’ event was started by Himachal’s leadingDivya Himachal Media Group three years ago to provide a platform to the budding and talented singers of the state. This year auditions were held at 13 places across the state in which nearly 1000 aspirants tried their luck in the singing field. All the contestants performed before panel of judges at various places and 180 contestants were shortlisted for a three day semi final held at Himalayan Group of Institutions in Kala Amb in Sirmaur district. Finally 20 finalists, 10 each in juniors and seniors categories, were selected for the grand finale held at Tanda Medical College auditorium. This event of Divya Himachal Media Group is gaining popularity with every passing year.

Berthin’s Gaurav was declared winner of ‘Himachal Ki Awaz-3′ after the grand finale. A B.Sc IInd year student, Gaurav had also participated in HKA-2 and had emerged as IInd runner up last year. He intends to make a career as Bollywood singer. Having started his singing career at the age of six years, Gaurav started his singing career from Badol Devi Jagran and also performed in Kala Sangram competition organised by Dhillon Creation, Chandigarh. Gaurav considers Master Saleem as his role model. His uncle Vijay Singh is helping Gaurav to realize his dream in singing field. People of Berthin gave Gaurav a rousing reception when he reached his native village after winning ‘Himachal Ki Awaz-3′ competition.

Hailing from Trehal village near Palampur, Ritwik Bhardwaj emerged as winner in Himachal ki Awaz-3 junior category. Inspired by the singing style of Hariharan, Ritwik is aiming to make a career as Bollywood music director. Ritwik not only brought laurels to his family but also to his music teach Tinku Raja under whose guidance he is training hard for the past one year. Ritwik had also won silver medal in PTC Punjabi’s Voice of Punjab besides showcasing his talent in Delhi Doordarshan’s Rafi Night.
Shimla - Chief Minister Virbhadra Singh today dedicated Rs 173 crore Ghanvi Stage II (10 MW) Hydel Electric Power (HEP) Project to the people at Ghanvi in Pandra Beesh area of Rampur Tehsil which would benefit the state by generating revenue of rupees twelve crore annually and 56 million unit of power. The power so produced would be routed through the Northern Grid. He also visited the dam site, the intake reservoir, constructed by M/S Hydro Construction Power Company from where the water would be released in the power house of Ghanvi Stage-II project.

नाथ संप्रदाय का भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे के संरक्षण में अद्वितीय योगदान है। लंबे समय से विदेशी दासता झेल रहे समाज में इस संप्रदाय ने नई स्फूर्ति पैदा की और ऊंच-नीच की भावना से परे जाकर आध्यात्मिक तत्व को समझने की दृष्टि पैदा की। आद्य शंकराचार्य इस संप्रदाय के आदि पुरुष माने जाते हैं। इसको वर्तमान रुप देने वाले योगाचार्य बालयति श्री गोरक्षनाथ को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। तंत्र और योग ग्रंथों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथाआें का विशद वर्णन हुआ है। श्री गोरक्षनाथ को वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत माना जाता है। उन्होंने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महाशक्तियों के विकास करने का उपदेश दिया और हठयोग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने का जनसमाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया। श्री गोरक्षनाथ ने योग संबंधी अनेकों ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे, जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके है और कई अप्रकाशित रुप में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं। श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानंद प्राप्त किया तथा जनकल्याण के लिए अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए। श्री गोरक्षनाथ ने सांसारिक मर्यादा की रक्षा के लिए श्री मत्स्येंद्रनाथ को अपना गुरु माना। ऐसी मान्यता है कि चिरकाल तक इन दोनों में शंका समाधान के रुप में संवाद चलता रहा। नाथपंथ का योगी संप्रदाय अनादि काल से चला आ रहा है। बुद्ध काल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुआ। वाममार्गी सिद्धांत बहुत ऊंचे थे, किंतु साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धांतों की वास्तविकता को नहीं समझ पा रहे थे और इस कारण पथभ्रष्ट हो रहे थे। इस काल में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ संप्रदाय को प्रचलित किया और तात्कालिक 84 सिद्धों में सुधार की प्रक्रिया को जन्म दिया। यह सिद्ध वज्रयान मतानुयायी थे। यह योगी संप्रदाय बारह पंथो में विभक्त है, यथाः-सत्यनाथ, धर्मनाथ, दरियानाथ, आई पंथी, रास के, वैराग्य के, कपिलानी, गंगानाथी, मन्नाथी, रावल के, पाव पंथी और पागल। इन बारह पंथ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भेद नही हैं। भारत के प्रायः सभी प्रांतों में इस योगी संप्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं। श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल में बहुत प्रतिष्ठित था और अब भी नेपाल के राजा इनको प्रधान गुरु के रुप में स्वीकार करते हैं। वहां पर इनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहां तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहां के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं। काबुल,गांधार, सिंध, बलूचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रांतों में श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊंचा मान पाया था। इस संप्रदाय में कई भांति के गुरु होते हैं जैसे कि चोटी गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु आदि। श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन,कान फाड़ना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाड़ने के प्रति तत्पर होने का मतलब कष्ट सहन की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य के प्रति अपनी आस्था प्रकट करना है। श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों, शिष्यों के लिए एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फड़ाने के पश्चात मनुष्य बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभावतः या लज्जा से बचता है। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को ‘औघड़’ कहते है और इसका आधा मान होता है। भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई महोत्सव मनाए जाते हैं। यह संप्रदाय अवधूत संप्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है- स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित जैसा कि सिद्ध सिद्धांत पद्धति में लिखा हैः-
बाबा बालकनाथ हिमाचल और पंजाब प्रांत के सर्वाधिक पूज्य सिद्ध हैं। नाथ संप्रदाय से उनके संबंधों के बारे में परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं लेकिन लोक कथाओं में इस बात का पर्याप्त प्रमाण मिलता है कि बाबा बालकनाथ का संबंध नाथ संप्रदाय से था। बाबा बालक नाथ की माता का नाम यशोदा और पिता का नाम दुर्गादत्त था। वे भार्गव ब्राह्मण थे। बाबा बालकनाथ का झुकाव बचपन से ही वैराग्य की ओर था। किशोरवय होते-होते उनकी प्रसिद्धि एक चमत्कारी सिद्ध के रूप में हो गई थी। एक बार उन्हें गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन हुए और वह उनके पीछे चलने वाले चेलों की लंबी भीड़ देखकर हैरान रह गए। उन चेलों में कुछ राजकुमार भी थे। बाबा बालकनाथ जी ने गुरु गोरखनाथ को अपना गुरु बनाने की सोची। लेकिन यह संभव नहीं था क्योंकि गुरु गोरखनाथ किसी बालक को अपना शिष्य नहीं बनाते थे। बाबा बालकनाथ जी जब शिष्य बनने की कामना के साथ गुरु गोरखनाथ के पास गए तो उन्होंने, उन्हें शिष्य बनाने से इनकार कर दिया और आगे चलकर कभी शिष्य बनाने का आश्वासन दिया। एक दिन गुरु गोरखनाथ जी उस नगरी आए जिस जगह बाबा बालकनाथ जी विराजमान थे,तब बाबा बालकनाथ ने उनके साथ चमत्कार करने का विचार किया और सोचा कि अगर वह मुझे पकड़ने में कामयाब हो गए तो मैं इन्हें अपना गुरु मान लूंगा। यह सोचकर बाबा बालकनाथ जी जब उनसे मिलने गए और शिष्य बनाने के लिए प्रार्थना की तो पहले गुरु गोरखनाथ जी ने उन्हें समझाया और कहा नाथ पंथ बहुत कठिन है,तलवार की धार पर चलने के समान है। लेकिन जब बाबा नहीं माने तो गोरक्षनाथ उन्हें शिष्य बनाने के लिए राजी हो गए। जब वह उनका कर्ण छेदन करने वाले थे तभी बाबा बालकनाथ जी हवा में उड़ गए। यह देखकर गुरु गोरखनाथ जी ने अपनी बाईं भुजा को बड़ा किया और बाबा बालकनाथ जी को पकड़ कर नीचे उतार लिया और कहा- यदि कोई और शंका मन में हो तो वह भी निकाल लो। मैंने तुम्हे भागने का मौका दिया था पर तुम नहीं भाग सके। अब जिसे याद करना हो कर लो अब तो तुम्हें शिष्य बनना ही पड़ेगा। यह सुनकर बाबा बालकनाथ जी ने कहा- गुरुदेव! आपके सिवा कोई याद करने लायक नहीं है। आप चाहे बंधन में रखकर कर्ण छेदन करें या बिना बंधन के बिना। इतना सुनकर गुरु गोरखनाथ जी ने उन्हें बंधनों से मुक्त कर दिया।
भारत में हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ जनपद स्थित अली सैयदपुर नामक एक साधारण से गांव में 25 दिसंबर, 1965 को गुलाबो देवी एवं रामनिवास यादव के घर जन्मे रामदेव का वास्तविक नाम रामकृष्ण था। बालक रामकृष्ण जब 9 वर्ष का था, तो कमरे में लगे क्रांतिकारी रामप्रसाद बस्मिल व स्वतन्त्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस के चित्र टकटकी लगाकर घंटों देखता और मन में विचार किया करता कि जब ये अपने पुरुषार्थ से युवकों के आदर्श बन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं बन सकता। समीपवर्ती गांव शहजादपुर के सरकारी स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने के बाद रामकृष्ण ने खानपुर गांव के एक गुरुकुल में आचार्य प्रद्युम्न व योगाचार्य बलदेव जी से संस्कृत व योग की शिक्षा ली। पहले वाला रामकृष्ण रामदेव के नए रूप में लोकप्रिय हुआ। रामदेव ने सन् 1995 से योग को लोकप्रिय और सर्वसुलभ बनाने के लिए अथक परिश्रम करना प्रारंभ किया। कुछ समय तक कालवा गुरुकुल, जींद जाकर निशुल्क योग सिखाया। तत्पश्चात् हिमालय की कंदराओं में ध्यान और धारणा का अभ्यास करने निकल गए। वहां से सिद्धि प्राप्त कर प्राचीन पुस्तकों व पाण्डुलिपियों का अध्ययन करने हरिद्वार आकर कनखल में स्थित स्वामी शंकरदेव के कृपालु बाग आश्रम में रहने लगे। आस्था चैनल पर योग का कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए माधवकांत मिश्र किसी योगाचार्य को खोजते हुए हरिद्वार पहुंचे, जहां बाबा रामदेव अपने सहयोगी आचार्य कर्मवीर के साथ गंगा तट पर योग सिखाते थे। माधवकांत मिश्र ने बाबा रामदेव के सामने अपना प्रस्ताव रखा। आस्था चैनल पर आते ही बाबा रामदेव की लोकप्रियता दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।
Mushroom farming is gaining popularity among farmers and youths in Himachal as the state offers congenial environment for its growth. Earlier, mushrooms were considered as a delicacy but now it seems to have invaded the food habits of Himachalies especially during winters when local grown mushrooms are available in abundance, feel experts. Earlier people used to grow different varieties of mushrooms to supplement their income but lately mushroom cultivation has been adopted at commercial level in different parts of the state. This has not only generated self employment opportunities for many youth but also engaged others in associated activities. In Himachal Solan has been given the title of ‘Mushroom City of India’ because of its industrialized mushroom cultivation. However, mushroom growers too face many problems including high input cost
The National Centre for Mushroom Research and Training (NCMRT) came into existence at Solan, later renamed as National Research Centre for Mushroom in 1983 during the VIth Five Year Plan under the auspices of Indian Council of Agricultural Research (ICAR). The Centre was formerly inaugurated on 21st June, 1987 by Dr. Gurdial Singh Dhillon, the then Union Minister for Agriculture and President of ICAR Society. It was upgraded to Directorate of Mushroom Research (DMR) on December 26, 2008. Established with the objective of undertaking research on all aspects of mushrooms and also to impart training to the trainers and growers, this centre is proving to be a boon for mushroom growers of Himachal as they look forward to it for all their problems.
Training programmes for farmers are being held by the NRCM, Dr. Y. S. Parmar University Horticulture and Forestry, Department of Horticulture and CSK Himachal Pradesh Agriculture University from time to time. The participants are imparted training in different aspects of mushroom cultivation, including preparation of compost, mushroom rearing and marketing. In addition, special camps are also organized to solve problems of mushroom growers.
Compost producing units are located in entire state both in public and private sector, yet the farmers face problem in procuring compost at the right time for mushroom cultivation. Horticulture Department is also providing subsidy on compost for marginal farmers but it is available at a rate of Rs. 7 to Rs. 8 per kg from private producers.
शिमला— इन्वेस्टर मीट के दौरान कर्नाटक के निवेशकों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा कि औद्योगिक विस्तार को मजबूती देना अब सरकार का लक्ष्य है। उन्होंने आईटी, ऊर्जा, शिक्षा व टूरिज्म पर आधारित बड़े निवेशकों को आश्वासन दिया कि हिमाचल में उन्हें हर सहूलियत दी जाएगी। उद्योग विभाग ने एक बड़ा लैंड बैंक विकसित किया है। प्रदेश में साल भर अतिरिक्त बिजली उपलब्ध रहती है। सड़क नेटवर्क मजबूत है। अन्य राज्यों की तुलना में गांव-गांव दूरसंचार नेटवर्क से जुड़ चुका है। उत्तरी क्षेत्र की बड़ी मार्केट प्रदेश के सीमांत इलाकों के नजदीक हैं, जो रेल से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल ने गत वर्षों में तरक्की की नई राहें तय की हैं। मौजूदा प्रचलित भावों के तहत यहां प्रति व्यक्ति आय 83899 आंकी गई है। साक्षरता दर 82.82 फीसदी है, जो इस क्षेत्र में सबसे ऊंची है। पूरे देश में शिक्षा के क्षेत्र में 1391 रुपए की दर से खर्च करने वाला हिमाचल पहला राज्य है। गुणवत्तायुक्त शिक्षा के तहत हर वर्ष हिमाचल से 60 हजार छात्र शिक्षित होकर निकल रहे हैं। लिहाजा उद्योगों के लिए शिक्षित युवाओं की भी यहां कमी नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस क्षेत्र में भी हिमाचल सर्वश्रेष्ठ राज्य है, जो 377 रुपए की दर से खर्च कर रहा है। उन्होंने कहा कि विषम भौगोलिक परिस्थतियों के बावजूद हिमाचल आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि मनिपाल यूनिवर्सिटी प्रदेश में शिक्षण संस्थान खोलना चाहती है तो उसका स्वागत किया जाएगा। उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने निवेशकों को आश्वासन दिया कि उन्हें हिमाचल में हर संभव सहायता दी जाएगी। उन्होंने निवेशकों को रेनबैकसी की मिसाल दी, जिसकी देश में नौ इकाइयां हैं, जिनमें से पांच हिमाचल में ही हैं। उन्होंने कैडबरी, डाबर, नेस्ले व अन्य बड़े निवेशकों की भी मिसाल दी। उन्होंने कहा कि निवेशकों को सभी तरह की क्लीयरेंस 90 दिन के अंदर जुटाई जा रही है। उन्होंने कहा कि निवेशकों की दिक्कतों का समाधान कर लिया गया है। यदि कोई निवेशक अपनी यूनिट बेचना चाहता है तो उसके लिए धारा-118 के नियमों में संशोधन किया गया है।