Saturday, 8 November 2014

मनरेगा घोटाले में पंचायत प्रधानों के खिलाफ कार्रवाई करें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

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मनरेगा घोटाले में पंचायत प्रधानों के खिलाफ कार्रवाई करें ः कोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। मनरेगा के तहत राज्य में करोड़ों रुपये के दुरुपयोग पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकार को स्पष्ट किया कि राज्य भर में मनरेगा के फंड का दुरुपयोग करने वाले ग्राम पंचायत प्रधानों और पंचायत अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके लिए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के लिए तीन माह की समय सीमा निर्धारित की है।
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मंसूर अहमद मीर और जस्टिस त्रिलोक चौहान की दो सदस्यीय खंडपीठ ने मामले से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक आदेश जारी किए। याचिका विपिन कुमार ने दायर की थी।
हाईकोर्ट ने आदेश में स्पष्ट किया कि राज्य भर की ग्राम पंचायतों के प्रधानों और पंचायत अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी उसके समक्ष पेश की जाए। प्रार्थी विपिन कुमार ने याचिका में आरोप लगाया था कि राज्य भर की ग्राम पंचायतों के प्रधानों और पंचायत अधिकारियों ने मनरेगा के तहत करोड़ों रुपये के सार्वजनिक फंड का दुरुपयोग किया है। प्रार्थी ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी कि राज्य सरकार को आदेश दिए जाएं कि वे पंचायत के अधिकारियों और पदाधिकारियों से इस फंड की वसूली करें।

बाबा बालकनाथ हिमाचल और पंजाब प्रांत के सर्वाधिक पूज्य सिद्ध हैं।

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समरसता का पर्याय है नाथ संप्रदाय

नाथ संप्रदाय की परंपरा में गुरु गोरक्षनाथ ने मध्यकाल में सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा अभियान चलाया। उनके अभियान में हिंदू धर्म की विभिन्न जातियों को स्थान मिला। उस समय तो कई मुस्लिम भी नाथ संप्रदाय में दीक्षित हुए और सिद्ध के रूप में प्रतिष्ठा पाई। श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े राजाओं ने इनसे दीक्षा प्राप्त की। अपने विपुल वैभव को त्याग कर ऐसे लोगों ने आत्मोप्लब्धि प्राप्त की तथा जनकल्याण के कार्य में अग्रसर हुए…
नाथ संप्रदाय का भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे के संरक्षण में अद्वितीय योगदान है। लंबे समय से विदेशी दासता झेल रहे समाज में इस संप्रदाय ने नई स्फूर्ति पैदा की और ऊंच-नीच की भावना से परे जाकर आध्यात्मिक तत्व को समझने की दृष्टि पैदा की। आद्य शंकराचार्य इस संप्रदाय के आदि पुरुष माने जाते हैं। इसको वर्तमान रुप देने वाले योगाचार्य बालयति श्री गोरक्षनाथ को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है। तंत्र और योग ग्रंथों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथाआें का विशद वर्णन हुआ है। श्री गोरक्षनाथ को वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत माना जाता है। उन्होंने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महाशक्तियों के विकास करने का उपदेश दिया और हठयोग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने का जनसमाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया। श्री गोरक्षनाथ ने योग संबंधी अनेकों ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे, जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके है और कई अप्रकाशित रुप में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं। श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानंद प्राप्त किया तथा जनकल्याण के लिए अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए। श्री गोरक्षनाथ ने सांसारिक मर्यादा की रक्षा के लिए श्री मत्स्येंद्रनाथ को अपना गुरु माना। ऐसी मान्यता है कि चिरकाल तक इन दोनों में शंका समाधान के रुप में संवाद चलता रहा। नाथपंथ का योगी संप्रदाय अनादि काल से चला आ रहा है। बुद्ध काल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुआ। वाममार्गी सिद्धांत बहुत ऊंचे थे, किंतु साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धांतों की वास्तविकता को नहीं समझ पा रहे थे और इस कारण पथभ्रष्ट हो रहे थे। इस काल में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ संप्रदाय को प्रचलित किया और तात्कालिक 84 सिद्धों में सुधार की प्रक्रिया को जन्म दिया। यह सिद्ध वज्रयान मतानुयायी थे। यह योगी संप्रदाय बारह पंथो में विभक्त है, यथाः-सत्यनाथ, धर्मनाथ, दरियानाथ, आई पंथी, रास के, वैराग्य के, कपिलानी, गंगानाथी, मन्नाथी, रावल के, पाव पंथी और पागल। इन बारह पंथ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भेद नही हैं। भारत के प्रायः सभी प्रांतों में इस योगी संप्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं। श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल में बहुत प्रतिष्ठित था और अब भी नेपाल के राजा इनको प्रधान गुरु के रुप में स्वीकार करते हैं। वहां पर इनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहां तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहां के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं। काबुल,गांधार, सिंध, बलूचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रांतों में श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊंचा मान पाया था। इस संप्रदाय में कई भांति के गुरु होते हैं जैसे कि चोटी गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु आदि। श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन,कान फाड़ना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाड़ने के प्रति तत्पर होने का मतलब कष्ट सहन की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य के प्रति अपनी आस्था प्रकट करना है।  श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों, शिष्यों के लिए एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फड़ाने के पश्चात मनुष्य बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभावतः या लज्जा से बचता है। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को ‘औघड़’ कहते है और इसका आधा मान होता है। भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई महोत्सव मनाए जाते हैं। यह संप्रदाय अवधूत संप्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है- स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित जैसा कि  सिद्ध सिद्धांत पद्धति में लिखा हैः-
‘सर्वान् प्रकृति विकारन वधु नोतीत्यऽवधूतः।’
अर्थात् जो समस्त प्रकृति विकारों को त्याग देता या झाड़ देता है, वह अवधूत है। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से अपने इष्ट देव का ध्यान करते है। परस्पर आदेश या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।योगी लोग अपने गले में काले ऊन का एक जनेऊ रखते है जिसे ‘सेली’ कहते है। गले में एक सींग की नादी रखते है। इन दोनों को सींगी सेली कहते है। नाथ संप्रदाय का संबंध शैव मत से होता है और यह आराध्य के रूप में भगवान शिव की आराधना करते हैं। नाथ संप्रदाय के अनुयायियों ने समय-समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देशभक्ति की उत्कृष्ट भावना को भी अभिव्यक्त किया है।
नाथ संप्रदाय और बाबा बालकनाथ
बाबा बालकनाथ हिमाचल और पंजाब प्रांत के सर्वाधिक पूज्य सिद्ध हैं। नाथ संप्रदाय से उनके संबंधों के बारे में परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं लेकिन लोक कथाओं में इस बात का पर्याप्त प्रमाण मिलता है कि बाबा बालकनाथ का संबंध नाथ संप्रदाय से था। बाबा बालक नाथ की माता का नाम यशोदा और पिता का नाम दुर्गादत्त था। वे भार्गव ब्राह्मण थे। बाबा बालकनाथ का झुकाव बचपन से ही वैराग्य की ओर था। किशोरवय होते-होते उनकी प्रसिद्धि एक चमत्कारी सिद्ध के रूप में हो गई थी।  एक बार उन्हें गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन हुए और वह उनके पीछे चलने वाले चेलों की लंबी भीड़ देखकर हैरान रह गए। उन चेलों में कुछ राजकुमार भी थे। बाबा बालकनाथ जी ने गुरु गोरखनाथ को अपना गुरु बनाने की सोची। लेकिन यह संभव नहीं था क्योंकि गुरु गोरखनाथ किसी बालक को अपना शिष्य नहीं बनाते थे। बाबा बालकनाथ जी जब शिष्य बनने की कामना के साथ गुरु गोरखनाथ के पास गए तो उन्होंने, उन्हें शिष्य बनाने से इनकार कर दिया और आगे चलकर कभी शिष्य बनाने का आश्वासन दिया। एक दिन गुरु गोरखनाथ जी उस नगरी आए जिस जगह बाबा बालकनाथ जी विराजमान थे,तब बाबा बालकनाथ ने उनके साथ चमत्कार करने का विचार किया और सोचा कि अगर वह मुझे पकड़ने में कामयाब हो गए तो मैं इन्हें अपना गुरु मान लूंगा। यह सोचकर बाबा बालकनाथ जी जब उनसे मिलने गए और शिष्य बनाने के लिए प्रार्थना की तो पहले गुरु गोरखनाथ जी ने उन्हें समझाया और कहा नाथ पंथ बहुत कठिन है,तलवार की धार पर चलने के समान है। लेकिन जब बाबा नहीं माने तो गोरक्षनाथ उन्हें शिष्य बनाने के लिए राजी हो गए। जब वह उनका कर्ण छेदन करने वाले थे तभी बाबा बालकनाथ जी हवा में उड़ गए। यह देखकर गुरु गोरखनाथ जी ने अपनी बाईं भुजा को बड़ा किया और बाबा बालकनाथ जी को पकड़ कर नीचे उतार लिया और कहा- यदि कोई और शंका मन में हो तो वह भी निकाल लो। मैंने तुम्हे भागने का मौका दिया था पर तुम नहीं भाग सके। अब जिसे याद करना हो कर लो अब तो तुम्हें शिष्य बनना ही पड़ेगा। यह सुनकर बाबा बालकनाथ जी ने कहा- गुरुदेव! आपके सिवा कोई याद करने लायक नहीं है। आप चाहे बंधन में रखकर कर्ण छेदन करें या बिना बंधन के बिना। इतना सुनकर गुरु गोरखनाथ जी ने उन्हें बंधनों से मुक्त कर दिया।

राष्ट्रयोगी रामदेव

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राष्ट्रयोगी रामदेव

cereerभारत में हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ जनपद स्थित अली सैयदपुर नामक एक साधारण से गांव में 25 दिसंबर, 1965 को गुलाबो देवी एवं रामनिवास यादव के घर जन्मे रामदेव का वास्तविक नाम रामकृष्ण था। बालक रामकृष्ण जब 9 वर्ष का था, तो कमरे में लगे क्रांतिकारी रामप्रसाद बस्मिल व स्वतन्त्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस के चित्र टकटकी लगाकर घंटों देखता और मन में विचार किया करता कि जब ये अपने पुरुषार्थ से युवकों के आदर्श बन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं बन सकता। समीपवर्ती गांव शहजादपुर के सरकारी स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने के बाद रामकृष्ण ने खानपुर गांव के एक गुरुकुल में आचार्य प्रद्युम्न व योगाचार्य बलदेव जी से संस्कृत व योग की शिक्षा ली। पहले वाला रामकृष्ण रामदेव के नए रूप में लोकप्रिय हुआ। रामदेव ने सन् 1995 से योग को लोकप्रिय और सर्वसुलभ बनाने के लिए अथक परिश्रम करना प्रारंभ किया। कुछ समय तक कालवा गुरुकुल, जींद जाकर निशुल्क योग सिखाया। तत्पश्चात् हिमालय की कंदराओं में ध्यान और धारणा का अभ्यास करने निकल गए। वहां से सिद्धि प्राप्त कर प्राचीन पुस्तकों व पाण्डुलिपियों का अध्ययन करने हरिद्वार आकर कनखल में स्थित स्वामी शंकरदेव के कृपालु बाग आश्रम में रहने लगे। आस्था चैनल पर योग का कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए माधवकांत मिश्र किसी योगाचार्य को खोजते हुए हरिद्वार पहुंचे, जहां बाबा रामदेव अपने सहयोगी आचार्य कर्मवीर के साथ गंगा तट पर योग सिखाते थे। माधवकांत मिश्र ने बाबा रामदेव के सामने अपना प्रस्ताव रखा। आस्था चैनल पर आते ही बाबा रामदेव की लोकप्रियता दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।
संपादित कार्य
इस युवा संन्यासी ने कृपालु बाग आश्रम में रहते हुए स्वामी शंकरदेव के आशीर्वाद, आचार्य बालकृष्ण के सहयोग तथा स्वामी मुक्तानंद जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के संरक्षण में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की स्थापना की। आचार्य बालकृष्ण के साथ उन्होंने अगले ही वर्ष सन् 1996 में दिव्य फार्मेसी के नाम से आयुर्र्वेदिक औषधियों का निर्माण कार्य भी प्रारम्भ कर दिया।
देश-विदेश से सम्मान
* न्यूयार्क अमरीका की संस्था नसाऊ काउंटी द्वारा सम्मानित
* न्यू जर्सी की सीनेट व जनरल असेंबली द्वारा सम्मानित
* ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ  कॉमन्स में  सम्मानित
* कलिंगा इंस्टीच्यूट ऑफ  इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी भुवनेश्वर द्वारा जनवरी 2007 में डीलिट योग की मानद उपाधि बरहामपुर विश्वविद्यालय द्वारा स्वामी जी को डाक्टरेट की मानद उपाधि इंडिया टुडे पत्रिका द्वारा  देश के सबसे ऊंचे, असरदार, शक्तिशाली व प्रभावशाली 50 लोगों की सूची में सम्मिलित एसोचैम द्वारा स्वामीजी को ग्लोबल नॉलेज मिलेनियम ऑनर

स्वार्थ और सरोकार के एनजीओ

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स्वार्थ और सरोकार के एनजीओ

( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं )
यह जमाना एनजीओ के फलने-फूलने का है, इसलिए बहुत से एनजीओ सिर्फ कागजी काम करके और अखबारों में खबरें छपवाकर सरकारी ग्रांट हड़प लेते हैं। खासकर सरकारी कर्मचारी और नौकरशाह, जिन्हें इन योजनाओं की जानकारी रहती है, अपनी बीवियों के नाम से एनजीओ चलाकर अपना धंधा चमकाने में लगे रहते हैं या फिर रिटायर हो चुके सरकारी अधिकारी भी बहुत से एनजीओ चला रहे हैं और तगड़ा पैसा कूट रहे हैं। लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए समाज सेवा एक जज्बा है और वे निःस्वार्थ रूप से अपने काम में जुटे हुए हैं…
एनजीओ (नॉन-गवर्नमेंट आर्गेनाइजेशन यानी गैर सरकारी संस्था) को एनजीओ कहा ही इसलिए जाता है, क्योंकि वह सरकारी संस्था न होते हुए भी ऐसा काम करती है, जिसे सरकार द्वारा किया जाना चाहिए था, पर सरकारें कर नहीं पातीं। यह जमाना एनजीओ के फलने-फूलने का है, इसलिए बहुत से एनजीओ सिर्फ कागजी काम करके और अखबारों में खबरें छपवाकर सरकारी ग्रांट हड़प लेते हैं। खासकर सरकारी कर्मचारी और नौकरशाह, जिन्हें इन योजनाओं की जानकारी रहती है, अपनी बीवियों के नाम से एनजीओ चलाकर अपना धंधा चमकाने में लगे रहते हैं, या फिर रिटायर हो चुके सरकारी अधिकारी भी बहुत से एनजीओ चला रहे हैं और तगड़ा पैसा कूट रहे हैं। लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए समाज सेवा एक जज्बा है, पैशन है और वे निःस्वार्थ रूप से अपने काम में जुटे हुए हैं।
बीबीसी की संवाददाता शिल्पा कन्नन ने अपने एक समाचार में ‘सोसायटी फॉर चाइल्ड डिवेलपमेंट’ का जिक्र करते हुए बताया है कि इस संस्था के सदस्य दिल्ली के होटलों और मंदिरों से टनों की मात्रा में फेंक दिए गए फूल चुनते हैं, ताकि वे इनसे प्राकृतिक रंग बना सकें जो मानवीय त्वचा के लिए नुकसानदेह नहीं हैं। इन रंगों का इस्तेमाल बहुत से पर्व-त्योहारों में होता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस काम में लगे इसके सदस्य नेत्रहीन हैं। ये खुद रंग-बिरंगे फूलों और इनसे बने रंगों को नहीं देख सकते, पर इस तरह से वे न केवल शहर से कचरे की सफाई कर रहे हैं, समाज को हानिरहित रंग देकर समाज सेवा कर रहे हैं। इसके साथ ही वालमार्ट जैसी बड़ी व्यापारिक संस्थाओं को ये रंग बेच कर न केवल खुद लाभ कमा रहे हैं, बल्कि वालमार्ट का व्यवसाय बढ़ाने में भी सहयोग दे रहे हैं। इस काम में वालमार्ट उन्हें कोई आर्थिक सहायता नहीं देती, पर वे उनका कारोबार खड़ा करने में अपनी विशेषज्ञता की मदद दे रहे हैं। कचरे को उपभोक्ता वस्तु में बदलने की चैरिटी का कारोबार करने वाली इस गैर सरकारी संगठन की निदेशक मधुमिता पुरी का कहना है कि हम गरीबी के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन गरीबी हमारी पीढ़ी के सामने मौजूद सबसे बड़ा अनसुलझा मसला है। भलाई का काम मसले का हल नहीं है। हम अपना सामान बेचने के लिए उपयुक्त बाजार तलाश रहे हैं। नेत्रहीन और दिमाग से कमजोर लोगों को जिंदगी में कुछ कर सकने की काबिलीयत सिखाने के लिए हम कारपोरेटस और बड़े कारोबारियों से मदद मांगते हैं। इस साल हमने बेकार छोड़ दिए गए फूलों से 18 टन रंग बनाए थे और अब हम बेकार फेंके गए कपड़ों से लैंप बना रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 80 फीसदी लोग साल में कम से कम एक बार चंदा जरूर देते हैं। भारतीय लोग विकलांग, बेघर, बूढ़ों और पढ़ाई-लिखाई के नाम पर पैसा देने से गुरेज नहीं करते हैं। गैर सरकारी संगठन ‘गूंज’ के अंशुल गुप्ता कहते हैं कि भारत में समस्याएं इतनी बड़ी हैं कि केवल आर्थिक विकास से चीजें सुलझने वाली नहीं हैं।
समाज सेवा की अपनी अहमियत है। समाज सेवा के कारोबार में उनके संगठन ने खूब तरक्की की है। जम्मू-कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों के लिए ‘गूंज’, ‘बुलंदी’ और ‘केयर इंडिया’ ने हाल ही में चंदा जमा करने की बड़ी मुहिम चलाई थी। समाज सेवा के काम को नई दिशा देते हुए सरकार ने भी भारतीय कंपनियों को अपने मुनाफे का दो फीसदी समाज की भलाई के लिए खर्च करने के लिए कहा है। नए नियमों के तहत 500 करोड़ रुपए से बड़ी पूंजी वाली कंपनियों को अपने मुनाफे का दो फीसदी सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करना होगा। माना जा रहा है कि तकरीबन 12 हजार कंपनियां इस दायरे में आ जाएंगी। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने चेतावनी भी दी है कि सरकार कंपनियों पर नजर रखेगी कि वे अपना पैसा सार्थक परियोजनाओं में खर्च करती हैं या नहीं। अभी दिवाली के समय मेरे मित्र एवं ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट के सीईओ ने एक बड़ा पुण्य का काम किया।
एनजीओ राउंड टेबल इंडिया और माई एफएम 93.4 के सहयोग से उन्होंने दिवाली पर एक अभिनव अभियान चला कर दिवाली के समय ट्राइसिटी चंडीगढ़ के लोगों से 900 रुपए की कीमत का एक विशेष दीया खरीदने की अपील की। इस तरह इकट्ठा होने वाले धन से उन्होंने अपनी आंखें खो चुके 18 वर्षीय किशोर विनोद की आंखों का आपरेशन करके उसे दोबारा देखने के काबिल बनाने का बीड़ा उठाया। माई एफएम ने इस अभियान का जमकर प्रचार किया। अभियान चलाने से पहले डा. ग्रेवाल और माई एफएम को उम्मीद थी कि वे लोगों को प्रेरित करके किसी न किसी तरह लगभग एक लाख रुपया इकट्ठा कर लेंगे और जबकि ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट ने आपरेशन पर खर्च होने वाली शेष राशि खुद देने का वादा किया। विनोद की दोनों आंखें बचपन से ही जाती रही थीं और इनको दोबारा देखने के काबिल बनाने के लिए आपरेशन के अलावा आने वाले कई वर्षों तक रिहेबिलिटेशन का काम करना होगा। ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट ने इस महत्ती जिम्मेदारी को संभाला है। विनोद के पिता रिक्शा चलाते हैं और उनके पास विनोद के आपरेशन के लिए आवश्यक आर्थिक साधन नहीं थे। बड़ी बात यह है कि इस अभियान में एक लाख रुपए की जगह तीन लाख रुपए से भी ज्यादा धन इकट्ठा हो गया और वह भी तब जब माई एफएम और ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट ने कई दानकर्ताओं से पैसे लेने से मना कर दिया, क्योंकि उनकी आवश्यकता से अधिक धन पहले ही इकट्ठा हो चुका था। एक सज्जन तो अपनी ओर से ब्लैंक चेक देने को तैयार हो गए, ताकि विनोद की आंखें दोबारा वापस आ सकें।
अब माई एफएम तथा ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट ने इकट्ठा हुए अतिरिक्त धन को और कई बच्चों के आपरेशन के लिए उपयोग करना आरंभ कर दिया है और ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट ने एक कदम और आगे बढ़ कर जन्म से सफेद मोतिया की शिकार दो साल की एक छोटी-सी बच्ची की आंख का सफल आपरेशन किया है, जो विश्व में अपनी तरह का तीसरा आपरेशन है। ग्रेवाल आई इंस्टीच्यूट द्वारा संचालित एनजीओ ‘रोशनी’ के डाक्टरों की पूरी टीम गांव-गांव जाकर पंचायतों, गुरुद्वारों, मंदिरों, लायंस क्लब, रोटरी क्लब और ऐसी अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर लगातार आई चैकअप कैंप लगाती रहती है और गरीबों-मजदूरों-वंचितों को साधनहीनता के कारण आंखों से न जाना पड़े। यह खुशी की बात है कि समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बिना किसी प्रचार की आशा के भलाई के कामों में लगे रहते हैं। अब एनजीओ ‘बुलंदी’ ने इसे एक सुशासित, सुसंचालित, संगठित अभियान बनाने की योजना पर काम करना आरंभ कर दिया है, ताकि समाज का समग्र विकास संभव हो सके। ‘बुलंदी’ से ‘बुलंदी.ओआरजी(ऐट)जीमेल.कॉम’ पर संपर्क किया जा सकता है। कारपोरेट सेक्टर ही नहीं, समाज का हर साधन संपन्न व्यक्ति इस अभियान का हिस्सा बन सकता है। यह निश्चय ही एक प्रशंसनीय शुरुआत है।

MushroomFarming Mushrooms in Himachal

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MushroomFarming Mushrooms in Himachal

Rajiv K. Phull              Cover Story
MushroomFarming Mushrooms in HimachalMushroom farming is gaining popularity among farmers and youths in Himachal as the state offers congenial environment for its growth. Earlier, mushrooms were considered as a delicacy but now it seems to have invaded the food habits of Himachalies especially during winters when local grown mushrooms are available in abundance, feel experts. Earlier people used to grow different varieties of mushrooms to supplement their income but lately mushroom cultivation has been adopted at commercial level in different parts of the state. This has not only generated self employment opportunities for many youth but also engaged others in associated activities. In Himachal Solan has been given the title of ‘Mushroom City of India’ because of its industrialized mushroom cultivation. However, mushroom growers too face many problems including high input cost
Why Eat Mushrooms?
Mushrooms are source of quality protein having essential amino acids and high digestibility.
*   No cholesterol and low fat with ergosterol and polyunsaturated fatty acids : Good for Heart.
*   Low calorific food with no starch, low sugars : Delight of Diabetics.
*   High Fibre, low sodium-high potassium diet : Anti-Hypertensive.
*   Good source of vitamin B-complex and Vit C; only vegetable source of Vit D.
*   Rich in minerals like copper (cardio-protective) & Selenium (anti-cancer).
*   Anticancer, Anti-HIV, Anti-viral, Anti-histaminic, Hypo-cholesterolemic,Hepato-& Nephro-protective, Anti-oxident, stamina enhancer, etc.
Sr. No.      Infrastructure          Location
1.     A) Mushroom Compost        Solan-3,Kullu-1, Production Units : Kangra -2, Sirmaur -1
B) Spawn Units                     Solan- 2, Sirmaur-1, Palampur -1
Private Sector
2.      A) Mushroom Compost      Solan-21, Shimla -6, Sirmaur -3,
Production Units                    Una -1, Kangra -2, Mandi -2, Kullu-1, Hamirpur -1
B) Spawn Units                    Solan -7, Sirmaur -1
NRCM a Boon for Mushroom Growers
Bhupender Thakur
HTWThe National Centre for Mushroom Research and Training (NCMRT) came into existence at Solan, later renamed as National Research Centre for Mushroom in 1983 during the VIth Five Year Plan under the auspices of Indian Council of Agricultural Research (ICAR). The Centre was formerly inaugurated on 21st June, 1987 by Dr. Gurdial Singh Dhillon, the then Union Minister for Agriculture and President of ICAR Society.  It was upgraded to Directorate of Mushroom Research (DMR) on December 26, 2008.  Established with the objective of undertaking research on all aspects of mushrooms and also to impart training to the trainers and growers, this centre is proving to be a boon for mushroom growers of Himachal as they look forward to it for all their problems.
Mandate:
*   To conduct mission-oriented and innovative research on all aspects of mushrooms
*   To act as the centre of academic excellence and repository of mushroom germplasm and information
*   To coordinate network research on location specific problems of national importance to achieve higher production and
productivity
*   To promote human resource development and transfer of technology
*   To provide technical support to the mushroom industry as well as to rural masses for poverty alleviation
Hybrid Seeds
Seeds of nearly two dozen varieties of mushrooms are prepared in NRCM centre located in Chambaghat. The centre is continuously doing research on hybrid mushroom seeds. According to available information mushroom growers can hope to get hybrid seed of white button mushroom variety in future. Hybrid seeds can be grown in lesser quantity of compost and the productivity of mushrooms will also increase. Researchers are focusing their work as to shorten the production time of hybrid seeds.
Training Programmes
HTWTraining programmes for farmers are being held by the NRCM, Dr. Y. S. Parmar University Horticulture and Forestry, Department of Horticulture and CSK Himachal Pradesh Agriculture University from time to time. The participants are imparted training in different aspects of mushroom cultivation, including preparation of compost, mushroom rearing and marketing. In addition, special camps are also organized to solve problems of mushroom growers.
2000 Mushroom Growers in Himachal
Nearly 2,000 farmers are engaged in mushroom production in the state, including small, marginal and big growers. Himachal is producing nearly 6-7 tones of mushrooms daily. As there is a huge gap in demand and supply of mushrooms, these are also imported from neighbouring states also.
Tremendous Potential for Self Employment
Experts feel that mushroom growing avocation has tremendous scope for generating self employment. Since Himachal has congenial environment for mushroom production as compared to other states besides having a huge market, educated unemployed youths can be motivated to adopt this avocation to earn livelihood. A survey in the past had pointed that per capita consumption in the country is nearly 30-40gms daily.
*   2000 Mushroom Growers in Himachal
*   Daily production is 6-7 tones
*   Per capita consumption is 30-40 gms in India
Shortage of Compost
HTWCompost producing units are located in entire state both in public and private sector, yet the farmers face problem in procuring compost at the right time for mushroom cultivation. Horticulture Department is also providing subsidy on compost for marginal farmers but it is available at a rate of Rs. 7 to Rs. 8 per kg from private producers.
*   Compost cost is Rs 8 per kg
*   Average selling price of mushrooms is Rs 100 to Rs. 125 per kg

साइंस मेले में आनी का दबदबा

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साइंस मेले में आनी का दबदबा

आनी - कुल्लू में आयोजित जिला स्तरीय साइंस मेले में विभिन्न प्रतियोगिताओं में आनी ब्लॉक का दबदबा रहा। आनी खंड के प्रभारी निहाल ठाकुर ने यह जानकारी दी। जिला स्तरीय प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करने के बाद अब ये होनहार छात्र 14 से 17 नवंबर में राज्य स्तरीय चिल्ड्रन साइंस कांग्रेस में प्रतिनिधित्व करेंगे। वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट अरबन वर्ग में ही आनी के सतीश ने तीसरा स्थान, एक्टिविटी कॉर्नर के शिल्ली जांजा और लॉरेंस पब्लिक स्कूल चवाई ने दूसरा और जूनियर अरबन में मिलियन मॉडल स्कूल के छात्रों ने दूसरा, जबकि लुहरी की अंजलि और सेजल ने वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट में दूसरा स्थान हासिल कर क्षेत्र का नाम रोशन किया है

हिमाचल से 60 हजार छात्र शिक्षित होकर निकल रहे हैं

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उद्योगों की हर जरूरत पूरी करेगा हिमाचल

NEWSशिमला— इन्वेस्टर मीट के दौरान कर्नाटक के निवेशकों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा कि औद्योगिक विस्तार को मजबूती देना अब सरकार का लक्ष्य है। उन्होंने आईटी, ऊर्जा, शिक्षा व टूरिज्म पर आधारित बड़े निवेशकों को आश्वासन दिया कि हिमाचल में उन्हें हर सहूलियत दी जाएगी। उद्योग विभाग ने एक बड़ा लैंड बैंक विकसित किया है। प्रदेश में साल भर अतिरिक्त बिजली उपलब्ध रहती है। सड़क नेटवर्क मजबूत है। अन्य राज्यों की तुलना में गांव-गांव दूरसंचार नेटवर्क से जुड़ चुका है। उत्तरी क्षेत्र की बड़ी मार्केट प्रदेश के सीमांत इलाकों के नजदीक हैं, जो रेल से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल ने गत वर्षों में तरक्की की नई राहें तय की हैं। मौजूदा प्रचलित भावों के तहत यहां प्रति व्यक्ति आय 83899 आंकी गई है। साक्षरता दर 82.82 फीसदी है, जो इस क्षेत्र में सबसे ऊंची है। पूरे देश में शिक्षा के क्षेत्र में 1391 रुपए की दर से खर्च करने वाला हिमाचल पहला राज्य है। गुणवत्तायुक्त शिक्षा के तहत हर वर्ष हिमाचल से 60 हजार छात्र शिक्षित होकर निकल रहे हैं। लिहाजा उद्योगों के लिए शिक्षित युवाओं की भी यहां कमी नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस क्षेत्र में भी हिमाचल सर्वश्रेष्ठ राज्य है, जो 377 रुपए की दर से खर्च कर रहा है। उन्होंने कहा कि विषम भौगोलिक परिस्थतियों के बावजूद हिमाचल आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि मनिपाल यूनिवर्सिटी प्रदेश में शिक्षण संस्थान खोलना चाहती है तो उसका स्वागत किया जाएगा। उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने निवेशकों को आश्वासन दिया कि उन्हें हिमाचल में हर संभव सहायता दी जाएगी। उन्होंने निवेशकों को रेनबैकसी की मिसाल दी, जिसकी देश में नौ इकाइयां हैं, जिनमें से पांच हिमाचल में ही हैं। उन्होंने कैडबरी, डाबर, नेस्ले व अन्य बड़े निवेशकों की भी मिसाल दी। उन्होंने कहा कि निवेशकों को सभी तरह की क्लीयरेंस 90 दिन के अंदर जुटाई जा रही है। उन्होंने कहा कि निवेशकों की दिक्कतों का  समाधान कर लिया गया है। यदि कोई निवेशक अपनी यूनिट बेचना चाहता है तो उसके लिए धारा-118 के नियमों में संशोधन किया गया है।
 योजना आयोग के विकल्प की जरूरत
कर्नाटक में इन्वेस्टर मीट के दौरान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने योजना आयोग के विकल्प पर बल देते हुए कहा कि अभी तक भी केंद्र सरकार ने इसे नहीं तलाशा है। नतीजतन राज्यों को वित्तीय आबंटन बीच राह रुक चुका है। वह जल्द ही केंद्र सरकार से आग्रह करेंगे कि इसका विकल्प जल्द तलाशा जाए। उन्होंने कहा कि शासन बदलने के बाद दिक्कतें आती हैं और यदि सरकारें पुरानी नीतियों व योजनाओं को बदलना चाहती हैं तो यह भी आवश्यक रहता है कि उनका विकल्प तत्काल जुटाया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि औद्योगिकरण के बूते एक विकसित हिमाचल का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
ऊना के अग्निहोत्री लगाएंगे 250 करोड़
ऊना के कोमल अग्निहोत्री जीएमएस शिपिंग कंपनी चला रहे हैं। वह टाहलीवाल से हैं और अपनी ही जमीन पर फूड पार्क व एग्रो आधारित प्रोजेक्ट स्थापित करना चाहते हैं। राज्य सरकार ने उनके प्रस्ताव को सैद्धांतिक अनुमति भी दे दी है। कोमल अग्निहोत्री पूरे विश्व में 60 फीसदी समुद्री जहाजों की खरीद-फरोख्त का कार्य करते हैं। उन्होंने प्रदेश में 250 करोड़ के पूंजी निवेश की ऑफर दी है।