Friday, 2 May 2014
चिखड़ेश्वर मंदिर प्रतिष्ठा के भव्य समारोह
Thursday, 1 May 2014
गाय के रूप में देश का आधे से अधिक पशुधन छोटे किसानों के पास है,
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वोट नहीं विकास का पर्याय है गौवंश
( राजेंद्र गुप्त लेखक, एज ऑफ एनलाइटेनमेंट न्यूज सर्विस के संपादक हैं )
गाय के रूप में देश का आधे से अधिक पशुधन छोटे किसानों के पास है, लेकिन जैसे-जैसे संगठित क्षेत्र इसमें कूद रहा है, भैंस की दुग्ध उत्पादकता अधिक होने के कारण ‘काउ बैल्ट’ में भी भैंस को प्राथमिकता मिलनी प्रारंभ हो गई है। मजाक में यहां तक कहा जाना लगा है कि वह दिन दूर नहीं, जब गोभूमि महिश भूमि कही जाने लगे। इसकी वजह यह है कि दोगुनी संख्या होने के बावजूद कुल दुग्ध उत्पादन में गाय की साझेदारी 43 प्रतिशत है। जहां तक गाय के दूध और घी की बात है, उसकी गुणवत्ता का कोई सानी नहीं है। गाय के दूध को मां के दूध से श्रेष्ठ कहा गया है और पोषकता की दृष्टि से संपूर्ण आहार …
जब भी लोकसभा के चुनाव होते है और देश की बागडोर कौन संभालेगा, इसकी बात आती है, तो पहला प्रश्न यही आता है कि सीटों की होड़ में किस राजनीतिक दल का ‘काऊ बैल्ट’ में पलड़ा भारी है। ‘काऊ बैल्ट’ अर्थात उत्तर भारत का वह मैदानी क्षेत्र जहां से होकर गंगा-यमुना बहती हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश से बिहार तक फैली ऐसी उपजाऊ भूमि जहां कभी न पानी का अभाव हुआ करता था और न चारे और चरागाहों का। जहां गाय कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। यह तो वैदिक समाज का जीवन के प्रति दृष्टिकोण है कि उससे यदि किसी से कुछ मिला, तो उसके प्रति कृतज्ञ हो गया। गंगा और गाय मां तथा देवियां बन गईं व सर्वाधिक आक्सीजन देने वाला बरगद का वृक्ष ब्रह्म। चेतन तो चेतन, जड़ भी पूज्य हो गए, धर्म हो गए, लेकिन दुनिया के प्राचीनतम वैदिक धर्म का यह उदात्त भाव जब राजनीतिक स्वार्थ के थपेड़ों से टकराता है, तो लहूलुहान हो जाता है। उसे दोनों ओर से ठोकर मिलती है, जो उसकी अनदेखी करता है या जो उसकी तरफदारी करता है। पिछले दिनों जब रायटर एजेंसी से खबर आई थी कि भारत ब्राजील के बाद दुनिया का सबसे बड़ा पशु मांस निर्यातक देश बन गया है, तो किसी से भी नहीं रहा गया। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने ‘काऊ बैल्ट’ की ही सरजमीं उत्तर प्रदेश और बिहार की चुनावी सभाओं में कांग्रेस को श्वेत (व्हाइट) क्रांति की बजाय गुलाबी (पिंक) क्रांति की पक्षधर बताकर शब्दों के स्तर पर तल्खी दिखाई, वहीं यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने यह कहकर कि यदि मवेशियों के वध पर अंकुश लगाया गया, तो न केवल देश अनुत्पादक मवेशियों के बोझ तले दब जाएगा, बल्कि ऐसे किसी कदम से लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे, जैसा नरम बचाव किया। संविधान निर्माण के समय ही इस विषय को राज्य की सूची में डाल दिया गया था और राज्यों में 1935 से लेकर 1995 तक के जो कानून लागू हैं, वे सभी गौवध को प्रतिबंधित करते हैं। बात अलग है कि इसका उल्लंघन करने पर जुर्माने और सजा के जो प्रावधान हैं, उनमें बड़ा फर्क है। कुछेक राज्यों को छोड़कर जहां इस पर जुर्माना दस हजार और सजा पांच साल है, आधे से अधिक राज्यों में जुर्माना एक हजार और सजा छह महीने की है। इसके अलावा गौवध से संबंधित कानून के जो सब-क्लॉज हैं, वे इस कानून को और हल्का कर देते हैं। जहां तक इस मामले में यूपीए सरकार की पहल की बात है, तो उसने वर्ष 2013 में राष्ट्रीय पशुधन नीति भी बनाई, परंतु उसमें भी नीति के अनुबंध 17.6 के तहत राज्यों को स्वयं और स्वयंसेवी संगठनों को गौशालाओं की स्थापना में आर्थिक सहयोग का पाठ पढ़कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया गया। केंद्र ने वर्ष 1962 में भारतीय पशु कल्याण परिषद की स्थापना की थी। यह सरकारी संस्था 14 जनवरी से लेकर 31 जनवरी का पूरा का पूरा एक पखवाड़ा भी पशु कल्याण के प्रति जनजागरण के रूप में मनाती है,परंतु उसका गौवंश और गौशालाओं के निर्माण के सहयोग का जो बजट है, वह ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है। पूरे देश के लिए यह संस्थान इस मद पर चार-छह करोड़ भी खर्च कर दे, तो बहुत है। ऐसा लगता है कि गौवंश के हितों को लेकर हमारे देश के नीति नियामकों की सोच तात्कालिकता पर टिकी है। पता नहीं कि दबावों में उसे धर्म की बजाय अर्थ के चश्में से देखने और तौलने की कोशिश नहीं की जाती, जबकि देश की बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में दूध और दुग्ध उत्पादों, स्वास्थ्य, ईंधन और पर्यावरण की दृष्टि से इस पर नए सिरे से सोचने और आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। हमारे अर्थज्ञ कहते हैं कि भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा 17.6 प्रतिशत पशुधन है, लेकिन यदि हमारी अपनी आबादी के हिसाब से देखें, तो वह भी विश्व की आबादी की 17 प्रतिशत है। अब यदि हम अपने केंद्रीय कृषि और पशुपालन मंत्रालय की रिपोर्ट पर जाएं, तो हम दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सिरमौर हैं। हमारा दुग्ध उत्पादन 133.8 मिलियन टन है और नेशनल डेयरी डिवेलपमेंट के आंकडों पर जाएं, तो इस हिसाब से प्रति व्यक्ति उपलब्धता 300 ग्राम है। हमारा दुग्ध उत्पादन चार प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ भी रहा है, लेकिन हमारी मांग छह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जो दूध की कीमतों में हर दो माह में हो रही वृद्धि के कारणों में से एक है। इसके चलते देश में दूसरी दुग्ध क्रांति की वकालत की जा रही है। मोटे तौर पर भारतीय समाज दूध के लिए गाय पर निर्भर रहा है और उसे प्राथमिकता भी देता रहा है। अभी भी हमारा जो पशुधन है, उसमें गाय और भैंस का अनुपात दो और एक का है। उसकी वजह संभवतः गाय के दूध की गुणवत्ता और उसके गृह पालन में सुविधा रहा है। गाय के रूप में देश का आधे से अधिक पशुधन छोटे किसानों के पास है, लेकिन जैसे-जैसे संगठित क्षेत्र इसमें कूद रहा है, भैंस की दुग्ध उत्पादकता अधिक होने के कारण ‘काउ बैल्ट’ में भी भैंस को प्राथमिकता मिलनी प्रारंभ हो गई है। मजाक में यहां तक कहा जाने लगा है कि वह दिन दूर नहीं, जब गोभूमि महिश भूमि कही जाने लगे। इसकी वजह है कि दोगुनी संख्या होने के बावजूद कुल दुग्ध उत्पादन में गाय की साझेदारी 43 प्रतिशत है। जहां तक गाय के दूध और घी की बात है, उसकी गुणवत्ता का कोई सानी नहीं है। गाय के दूध को मां के दूध से श्रेष्ठ कहा गया है और पोषकता की दृष्टि से संपूर्ण आहार। आयुर्वेद में इसका दूध न केवल सुपाच्य, बल्कि उसके पीले रंग के लिए जिम्मेदार कैरोटिन तत्त्व को कैंसररोधी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करने वाला बताया गया है। व्यक्ति की प्रकृति और दिनचर्या के हिसाब से गाय के घी और दूध का आनुपातिक मात्रा में सेवन सुरक्षित तो है ही, आयुर्वेद की कितनी ही औषधियों के सेवन में इनके अनुपान की तरह प्रयोग करने की संस्तुति की गई है। गाय घी रसायन श्रेणी की औषधियों के भोषण और पाचन में उत्प्रेरक का कार्य करता है। कहने का आशय गाय के दूध के पोषक और औषधि मूल्य के सामने भैंस के दुग्ध उत्पादकों का कोई मुकाबला नहीं है। गाय के अर्थशास्त्र को झुठलाने में जो दो तर्क दिए जाते हैं, उनमें पहला है, घटते चरागाहों के चलते बूढ़ी और दूध न देने वाली गउओं का भरण पोषण और दूसरा खेती में टै्रक्टर और अन्य मशीनों के बढ़ते प्रयोग के चलते बैलों की घटती उपयोगिता है। यह बचत कई गुना हो सकती है। यह बात उनके लिए जानना जरूरी है, जो गौवंश के संरक्षण के हिमायती तो हैं, लेकिन विरोधियों को कोसकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। अंधेरे को बुरा भला कहने से अंधेरा दूर नहीं होता। उसके लिए प्रकाश लाना पड़ता है। बूचड़खाने खुद-ब-खुद बंद हो जाएंगे, पुनर्वास गोशालाएं स्थापित करने के लिए आगे तो आइए?
60 गउओं के भूख के कारण दर्दनाक मौत कुल्लू में
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बेजुबानों पर कलियुगी इनसानों का प्रहार
(मेघ सिंह कश्यप लेखक, भुंतर, कुल्लू से हैं।)
अब तो हिमाचल को देवभूमि कहते हुए भी झिझक होती है। जिस गाय को माता कहा जाता है, वह मरने के लिए छोड़ दी जाती है। मनुष्य अपने आप को सब प्राणियों में श्रेष्ठ समझता है, पर आजकल हो रही वारदातों को देखते हुए तो यही लगता है कि मनुष्य अब सबसे ज्यादा गिर गया है…
जिला कुल्लू के प्रवेश द्वार भुंतर से सटे जिया गांव के थाच नामक टापूनुमा स्थान पर लगभग 60 गउओं के भूख के कारण तड़प-तड़प कर दर्दनाक मौत की खबर ने दिल दहला दिया। इस दिल दहला देने वाली दर्दनाक घटना ने एक बार फिर से देवभूमि को भी शर्मसार किया है। क्योंकि यह घटना देवों के देव बिजली माहदेव के चरणों के समीप व पार्वती नदी के साथ की है। लोगों ने अपनी फसलों को बचाने के लिए इन बेजुबान पशुओं को एक ऐसे स्थान पर छोड़ दिया था, जहां से आने-जाने का मात्र एक ही रास्ता था। उस रास्ते को एक पिल्लर लगा कर बंद कर दिया था, ताकि कोई पशु अपने स्थान को वापस न आ सके। अगर कोई बेजुबान पशु आने की कोशिश करते तो रास्ते में लगे पिल्लर से टकराने से फिसल कर पहाड़ी से गिरकर मौत के आगोश में समा जाते, जो पशु उस टापूनुमा स्थान पर रह गए उन्हें मौसम की बेरुखी और घास की कमी मार गई। गांव के बाशिंदों ने तो अपनी फसल बचाने के लिए उन पशुओं को एकांत स्थान पर छोड़ दिया था। लेकिन उसका परिणाम भयानक और दर्दनाक रहा, इस घटना के सबसे ज्यादा दोषी तो वे लोग हैं, जिन्होंने गौ माता का दूध पीकर उन्हें आवारा छोड़ दिया है। प्रशासन को इस मामले में सभी पहलुओं को केंद्र में रख कर उचित कार्रवाई करनी चाहिए। बेजुबान पशुओं पर जुल्म ढहाने वालों को न वख्शा जाए। क्योंकि मामला पशु क्रूरता अधिनियम के तहत बनता है। हिमाचल प्रदेश के किसी भी कोने में चले जाओ, आवारा पशुओं का कहर तो हर गांव तथा शहर में है। गांव में ये पशु किसानों के खेत- खलिहानों में लगी फसलों को तहस-नहस व तबाह कर देते हैं तथा शहर में चलते-फिरते राहगीरों, दुकानदारों और सड़क पर चलने वाली गाडि़यों को भी आवारा पशुओं का शिकार होना पड़ता है, लेकिन ये बेजुबान व लाचार पशु कहां जाएं। यह तो उन एहसान फरामोश व घटिया लोगों की सोच का परिणाम है, जो गौ माता का दूध पी कर और बैलों को हल जोतने के बाद तथा घोड़ों और गधों से भार ढोने का काम लेने के बाद, जब ये बेजुबान पशु किसी भी काम के नहीं रहते, तो इन्हें राम भरोसे आवारा छोड़ देते हैं। फिर बेजुबान पशु अपना पेट कैसे भी भरें। किसान कड़ी मेहनत मजदूरी करके खेतों में फसल तैयार करते हैं, लेकिन जब आवारा पशुओं का हमला लहलहाते खेतों पर होता है, तो पूरी की पूरी फसल तबाह कर देते हैं। तब किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है और इस महंगाई के जमाने में फसल तबाह होने से पारिवारिक बजट गड़बड़ा जाता है। आखिर पशुओं का आतंक फैलाने वाले भी इसी समाज के लोग हैं, जो इन्हें इस्तेमाल कर आवारा छोड़ देते हैं। अपनी-अपनी फसल का बचाव करने के लिए लोग इन पशुओं का स्थानांतरण इधर-उधर करते हैं। पशु बेजुबान जरूर हैं, लेकिन अपना स्थान नहीं भूलते। इन्हें जहां मर्जी छोड़ दें, ये अपने स्थान पर दोबारा पहुंच जाते हैं। गैर सरकारी संगठनों द्वारा पशुओं की देखरेख के लिए कुछ गौ सदन भी बनाए गए, लेकिन गौसदन योजना भी अब लगभग हांफती हुई नजर आ रही है। जब ये आवारा पशु किसी का नुकसान करते हैं, तो गुस्से में कलियुगी इनसान बेजुबान पशु पर इतनी निर्दयता के साथ प्रहार करता है कि किसी पशु की टांग टूटी होती है और किसी का पूरा शरीर लहूलुहान देखने को मिलता है। जिला मंडी के जोगिंद्रनगर में हाल ही की एक घटना है। भारतीय डाक व तारघर के एक कर्मचारी ने शराब के नशे में धुत्त होकर एक गाय को बहुत ही बेरहमी से पीट कर लहूलुहान कर दिया, लेकिन प्रशासन ने उसके ऊपर कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई। इसी तरह बेजुबान पशुओं पर असामाजिक तत्त्व न जाने कब तक जुल्म ढहाते रहेंगे। प्रदेश सरकार को पशु संरक्षण के लिए गहरा चिंतन कर पशुओं का पंजीकरण सख्ती से लागू करना चाहिए और जो भी बेजुबान पशुओं को आवारा छोड़ता पकड़ा जाए, उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाए। अब तो हिमाचल को देवभूमि कहते हुए भी झिझक होती है। जिस गाय को माता कहा जाता है, वह मरने के लिए छोड़ दी जाती है। मनुष्य अपने आप को सब प्राणियों में श्रेष्ठ समझता है, पर आजकल हो रही वारदातों को देखते हुए तो यही लगता है कि मनुष्य अब सबसे ज्यादा गिर गया है। यानी अब वह मनुष्य कहलाने लायक ही नहीं है।
हिमाचली झलक का अनुपम सौंदर्य भोलापन और पहाड़ी भाषा
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सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं मेले
chavinder sharma
इसमें संदेह नहीं है कि जीवन में समृद्धि के जिस संदेश को प्रचार-प्रसार से भी हम दूसरे तक पहुंचाने में असमर्थ रहते हैं, उसी प्यार और समृद्धि का संदेश हम अपने सांस्कृतिक स्थानीय मेलों के जरिए बड़ी आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं…
देवभूमि हिमाचल की वादियां अपने सौंदर्य आकर्षण के लिए तो विश्व विख्यात हैं ही, इसके साथ-साथ इसे मंदिरों व शक्तिपीठों की स्थली के रूप में भी प्रसिद्धि प्राप्त है। प्रदेश में वर्ष भर सैलानियों का आवागमन निरंतर जारी रहता है। नवरात्र, त्योहारों व मेलों में उमड़ता जन सैलाब यहां के पर्वों को चार चांद लगा देता है। पहाड़ी इलाकों में पर्वों की धूमधाम व मेलों का आगाज यहां प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत से रू-ब-रू करवाता है। प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को बहुत हद तक मेलों व त्योहारों में निहित देखा जा सकता है, जहां पर हिमाचली पहनावे से लेकर परंपरागत वस्तुओं व पकवानों का दीदार हो जाता है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में मेलों व त्योहारों का महत्त्व स्थानीय घटना व इलाके विशेष की खासियत का पदार्पण करता है। जीवन मूल्यों की विशेष झलक से व्यक्ति सराबोर हो जाता है व आस्था की निर्मल धारा का विकास इन्हीं मेलों व त्योहारों से व्यक्ति ग्रहण करता है। आज विकास की धारा में जो क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, उसके दर्शन इन विशेष आयोजनों में हमारे जीवन में बदलाव की स्थिति लाते हैं। परिवर्तन की इस अमिट धारा में आगाज पर इन मेलों में एक खासा आकर्षण पैदा हुआ है। उकताहट भरी जीवन की दौड़ में ये मेले व त्योहार एक हलका सा विराम लगाकर व्यक्ति को अपने में संजोने का प्रयत्न करते हैं। इन मेलों में हास्य मिश्रित कोलाहल व टमक की थाप और नगाड़ों के कंपन का मिला जुला असर हमारे अंग प्रत्यंग में सौम्य सिहरन और रोचकता का आभास करवाता है। वर्तमान समय में जिस तरह हम इंटरनेट, टीवी की वजह से अपने घरों तक ही सिमट कर रह गए हैं, ऐसे में मेलों का आगाज व हलचल से उत्पन्न कौतुहल हमें अवश्य रोचकता प्रदान करता है और यही रोचकता हमारे अंग प्रत्यंग में एक अद्भुत निखार की लहर पैदा कर जाती है। इन मेलों में संस्कृति के आदान-प्रदान हेतु बाहरी राज्यों से पर्यटकों व सैलानियों का आना-जाना बदस्तूर जारी रहता है। अधिकतर सैलानी वादियों की सुंदरता के साथ-साथ यहां पर्वों व मेलों में शिरकत करने के उद्देश्य से आते हैं, कुछेक व्यापारी, कारोबार की दृष्टि से भी यहां पदार्पण करते हैं। सैलानियों या व्यापारियों का उद्देश्य कुछ भी हो, परंतु बदले में हिमाचली झलक का अनुपम सौंदर्य भोलापन और पहाड़ी भाषा के माधुर्य को अपने में समाहित कर लोट-पोट हो जाते हैं। जहां इन मेलों व त्योहारों से हमें जीवन के असंख्य परिदृश्यों का अमिट साक्षात्कार होता है, वहीं हमें कई अनोखे एहसास सदा के लिए ओत-प्रोत कर जाते हैं। जहां मेलों में अन्य चीजों का आकर्षण होता है, वहीं दंगल का आयोजन मेले में अलग से भीड़ को आकर्षित कर जाता है। कुछ लूटपाट व ठगी में संलिप्त मेलों के स्वच्छ वातारण को कलुषित कर देते हैं तथा मेलों के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं। मनचलों की युवतियों से छेड़छाड़ का उपक्रम भी इन मेलोें में दृष्टिगत हो जाता है, जिससे हमारी देवभूमि शर्मसार हो जाती है। मेलों के आनंद को भंग करने वालों के लिए पुलिस चौकी तो होती है, परंतु कभी-कभी अधिक भीड़ में उमड़ते जन सैलाब के कारण पुख्ता इंतजाम भी धरे के धरे रह जाते हैं, ऐसे में अधिक बलों व ज्यादा चौकसी की जरूरत है। हमें मेलों की समृद्धि से अपनी समृद्ध संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। हमारे प्रदेश में वर्ष भर कहीं न कहीं मेलों का जमावड़ा बच्चों की खुशनुमा चहचहाहट, बांसुरियों की धुन के सुरीले स्वर व मिष्ठानों की खुशबू का नशा मदमस्त करता रहता है। इसमें संदेह नहीं है कि जीवन में समृद्धि के जिस संदेश को प्रचार-प्रसार से भी हम दूसरे तक पहुंचाने में असमर्थ रहते हैं, उसी प्यार और समृद्धि का संदेश हम अपने सांस्कृतिक स्थानीय मेलों के जरिए बड़ी आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। आस्था के प्रतीक इन मेलों का हर किसी को बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं, बच्चे भी वर्ष भर अपने स्थानीय मेले की अमुक तारीख को मन में संजोए रखते हैं। भले ही आज मेलों के लिए सिमट रही जगह की कमी आड़े आने लगी है, परंतु फिर भी व्यवस्था के चलते मेला कमेटियां थोड़ी जगह में ही रौनक और सौंदर्य प्रदान करने में सफल रही हैं। मेले हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीकात्मक स्वरूप हैं, जिन्हें हमें वर्तमान परिस्थितियों में और भी ज्यादा समृद्ध करने के लिए प्रयासरत रहने की आवश्कता है।
प्रदेश के ग्रामीण मंदिरों की व्यवस्था इतनी चिंताजनक
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देव संस्कृति के संरक्षण की जरूरत
( सुरेंद्र ठाकुर लेखक, ठियोग, शिमला से हैं )
प्रदेश के ग्रामीण मंदिरों की व्यवस्था इतनी चिंताजनक है, यदि सरकार एवं जागरूक समाज द्वारा इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो हिमाचल की सदियों पुरानी देव संस्कृति की जानकारी आने वाली पीढि़यों को इतिहास की पुस्तकों में मिलेगी…
हिमाचल प्रदेश की गौरवमय देव संस्कृति के कारण हिमाचल को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। हिमाचल के देवी-देवताओं का प्रदेश के सामाजिक सौहार्द में विशेष योगदान है। इसके अलावा धार्मिक पर्यटन प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हिमाचल के मंदिरों में आने वाले श्रद्धालु न केवल प्रदेश के मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा देकर जाते हैं, अपितु स्थानीय जनता को रोजगार के अवसर भी पैदा करते हैं। हिमाचल के शक्तिपीठ एवं बड़े मंदिर हालांकि स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर मंदिर कमेटियों का गठन करते हैं और इन कमेटियों द्वारा मंदिरों एवं श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए अनेक योजनाएं बनाई जाती हैं। सरकार एवं प्रशासन के ये मामूली प्रयास देव संस्कृति को बचाने के लिए काफी नहीं हैं। सरकार एवं प्रशासन को चाहिए कि वे एक ऐसी ठोस एवं कारगर नीति बनाएं, ताकि गौरवमय देव संस्कृति को बचाने के साथ-साथ हिमाचल की आर्थिकी को भी सुदृढ़ किया जा सके। हिमाचल की देव संस्कृति को बचाने के लिए जहां पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, वह है हिमाचल के ग्रामीण मंदिर। प्रदेश के ग्रामीण मंदिरों की व्यवस्था इतनी चिंताजनक है, यदि सरकार एवं जागरूक समाज द्वारा इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो हिमाचल की सदियों पुरानी देव संस्कृति की जानकारी आने वाली पीढि़यों को इतिहास की पुस्तकों में मिलेगी। हिमाचल के ग्रामीण देवी-देवता करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। इन ग्रामीण मंदिरों में करोड़ों की संपत्ति की व्यवस्था का जिम्मा कुछ परिवार पुश्तैनी आधार पर संभालते हैं, जिसमें पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव होता है। सरकार को चाहिए कि इन मंदिर कमेटियों को अपनी नकदी एवं संपत्तियों में पारदर्शिता लाने हेतु प्रोत्साहित करें और यदि संभव हो तो स्थानीय स्तर पर खातों का ऑडिट किया जाना चाहिए। देव समाज के कारदारों एवं मंदिर कमेटियों को यह बात समझनी चाहिए। मंदिरों के खातों की पारदर्शिता जनता की देव समाज के प्रति आस्था को मजबूत करेगी। हिमाचल के देवी-देवता एक ओर तो करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं, तो दूसरी ओर अभी तक अधिकतर मंदिरों में बैंकों में नकदी रखने का प्रचलन नहीं है। सरकार एवं प्रशासन को चाहिए कि इन ग्रामीण मंदिर कमेटियों को अपनी नकदी बैंकों में रखने हेतु प्रोत्साहित करें, जिससे लोगों की आस्था के लाखों रुपए का उपयोग राष्ट्र के विकास में होगा और मंदिरों में होने वाली चोरियों एवं अग्निकांडों से भी संपत्तियों एवं नकदी की रक्षा हो पाएगी। इसके अलावा ग्रामीण मंदिरों में कई ऐसी दुर्लभ मूर्तियां, सिक्के एवं अन्य वस्तुएं हैं, जिसकी कीमत का अंदाजा शायद इन मंदिर कमेटियों एवं स्थानीय जनता को भी नहीं है, जिसके कारण ये मंदिर चोरों के निशाने पर रहते हैं। मंदिरों में आए दिन होने वाली चोरी की घटनाओं से करोड़ों की संपत्ति की लूट के साथ-साथ जनता की देव समाज के प्रति आस्था पर भी कुठाराघात होता है। सरकार एवं प्रशासन को चाहिए कि स्थानीय मंदिर कमेटियों के साथ मिलकर इन कीमती एवं दुर्लभ संपत्तियों की सुरक्षा की व्यवस्था करें। मंदिरों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और संभव हो तो मंदिरों की सुरक्षा का जिम्मा होमगार्ड या अन्य किसी सुरक्षा एजेंसी को दिया जाए। हिमाचल के अधिकतर मंदिरों के पास फंडों की अधिकता है, परंतु इन मंदिर कमेटियों के पास इन फंडों को खर्च करने की कोई कारगर योजना नहीं होती, जिसके कारण लाखों रुपए व्यर्थ के आडंबरों पर खर्च कर लिए जाते हैं। मंदिर कमेटियों को चाहिए कि अपने कोष का उपयोग सामाजिक कार्यों एवं पिछड़े व गरीब लोगों के उत्थान पर खर्च करें। इससे न केवल लोगों की आस्था में वृद्धि होगी, अपितु धर्म का मूल उद्देश्य भी चरितार्थ होगा। हिमाचल की देव संस्कृति का हजारों वर्षों का गौरवमय इतिहास है, हमारी थोड़ी सी चूक इसके भविष्य पर संकट खड़ा कर सकती है। अतः इसके लिए गंभीर प्रयास किए जाने आवश्यक हैं, पर यह तभी संभव है यदि प्रशासन का सहयोग एवं जागरूक समाज का निरंतर प्रयास जारी रहे। प्रदेश के मंदिर आस्था और आर्थिकी का सामजस्य बिठाते हैं, तो इनके प्रति सब को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
प्रतिस्पर्धी बने राज्यों का विकास प्रारूप
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प्रतिस्पर्धी बने राज्यों का विकास प्रारूप
( प्रो. एनके सिंह लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं )
कुछ नेता ऐसा दावा कर रहे हैं कि गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ है, लेकिन उनकी बातें झूठी हैं। इकोनामिक टाइम्स ने आंकड़ो का विस्तृत परीक्षण करके यह बताया है कि सामाजिक क्षेत्र में भी राज्य का प्रदर्शन संतोषजनक है। यह विमर्श कि यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए अच्छा नहीं है और इसे हर जगह नहीं लागू किया जा सकता, पूरी तरह मिथ्या है। मानवतावाद, सुशासन और आर्थिक सुधार गुजरात के सबक हैं। पूरे भारत में इसका अनुगमन किया जाना चाहिए…
आजकल सभी लोगों की जुबान पर विकास शब्द है। लेकिन यह शब्द तेजी से अपना अर्थ खोता जा रहा है क्योंकि कुछ लोग धन के वितरण, बिजली आपूर्ति व्यवस्था की मरम्मत अथवा सरकारी योजनाओं के दुष्प्रचार को ही विकास का नाम दे देते हैं। मैं दलगत राजनीति का हिस्सा बने बगैर इस शब्द के चारों ओर छाए हुए कुहासे को दूर करने की कोशिश करना चाहूंगा। किसी नलकूप की मरम्मत करना विकास नहीं है। यह निश्चित रूप से ही एक सेवा है। लेकिन लोगों और उद्योगों को चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली की आपूर्ति करना विकास है। सबसिडी देकर बिजली की दरों को कम कर देने को भी विकास नहीं माना जा सकता। स्वतंत्रता के बाद व्यक्तिगत और दलगत पूर्वाग्रहों के कारण गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के लिए भारत ने विकास के समाजवादी प्रारूप को अपनाया था। इस विकास प्रारूप के कारण राज्य का नियंत्रण बढ़ गया और लोग अपनी प्रत्येक चीज के लिए सरकार पर निर्भर हो गए। एक सीमित समयावधि तक लाइसेंस और कोटे पर आधारित यह प्रारूप चलता रहा, लेकिन इसके कारण आम लोगों को प्रतिस्पर्धी कीमत और गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध नहीं हो पा रहे थे। हम टिन बॉक्स की तरह लगने वाली कारों पर लंबे समय तक चलते रहे और एक फोन कनेक्शन को प्राप्त करने के लिए सालों दौड़ लगाते थे। तथाकथित आत्मनिर्भरता की इस कोठरी ने हमें भारी उद्योग और बड़े बांध दिए, लेकिन यह गरीबी को नहीं घटा सका और न ही अमीरी को बढ़ा सका। भारत हिंदू वृद्धि की दर से आगे बढ़ता रहा और इस मार्ग के अंतिम छोर पर भारत को अपना घाटा कम करने के लिए सोने के भंडार को गिरवी रखना पड़ा। इस समयावधि में पूरी दुनिया में भारी बदलाव आ चुका था। ब्रिटेन, जिसे हम अपना संदर्भ बिंदु मानते थे, में भी थैचर ने निजी सहभागिता के जरिए उदारवादी अर्थव्यवस्था का नया प्रारूप गढ़ने हेतु निजीकरण को बढ़ावा दिया। इसके कारण निजी उद्यमशीलता के सामूहिक प्रयासों से विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। मुक्त प्रतिस्पर्धा और व्यापार तथा उद्योग की सृजनात्मक वृद्धि इस प्रारूप का सार था। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में नरसिम्हा राव ने उदारीकरण को बढ़ावा दिया और सरकारी नियंत्रण को सीमित किया। इसका श्रेय मनमोहन सिंह अथवा नरसिम्हा राव को नहीं दिया जा सकता क्योंकि उस समय आर्थिक स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धा की वैश्विक बयार बह रही थी और उससे बच पाना मुश्किल था। इसके कारण सोवियत संघ और अन्य देशों में समाजवाद का किला ढह गया। म्यांमार जैसे जिन देशों ने इस बहाव का हिस्सा बनना स्वीकार नहीं किया, वे अब भी विकास की आदिम और स्तब्धकारी दशा में बने हुए हैं। भारत ने कुछ सीमाओं के साथ खुली अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया और अमरीका की तरह विशुद्ध पूंजीवादी मार्ग को स्वीकार नहीं किया। यह एक तरह से साम्यवाद ही था जिसे भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए अपनाया गया था और जब डांवांडोल स्थिति वाले वित्तीय संस्थानों को अमरीका ने सहायता पहुंचाने की कोशिश की तो यह उसके लिए भी विनाशक साबित हुई। यह विशुद्ध पूंजीवाद का उदाहरण नहीं था। हमारे अर्द्ध-संघात्मक ढांचे में राज्यों को भी अपनी शैली में उदारवाद को बढ़ाने के रास्ते उपलब्ध हैं। पश्चिम बंगाल लंबे समय तक समाजवाद से चिपका रहा और इसी कारण विकास में पिछड़ गया। पिछले दस वर्षों में महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने भी निवेश को आकर्षित किया है और विकास को गति प्रदान की है। सन् 2000 कर्नाटक के लिए बहुत लाभकारी साबित हुआ क्योंकि दो अंकों वाले वर्षों को रातोंरात चार अंक वाले वर्ष में बदलने के हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ी। इस क्रांति के कारण रोजगार के अवसर पैदा हुए और इन्फोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी विशालकाय कंपनियां, जो पूरी दुनिया में तेज सेवा देने के लिए जानी जाती हैं, का उद्भव हुआ। नरेंद्र मोदी ने पिछले दस वर्षों में निजी क्षेत्र में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करके तथा अवसंरचना और कृषि विकास में उल्लेखनीय विकास करके गुजरात का कायाकल्प कर दिया है। सुशासन और पारदर्शिता को ध्येय मानने वाले यहां के नेतृत्व ने गुजरात को प्रमुख स्थान पर पहुंचा दिया है। राज्य में चौबीसों घंटे बिजली की निर्बाध आपूर्ति, रेगिस्तानों को भी पर्यटन स्थल के रूप में तबदील कर देना और अवसरंचना विकास जैसी उनकी उपलब्धियों के बारे में लोग जानते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कृषि क्षेत्र में है। 2000 में इसकी विकास दर 2.3 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 9.8 प्रतिशत हो गई है। 54 प्रतिशत लोगों को रोजगार देने वाले इस क्षेत्र में यह उल्लेखनीय विकास हुआ है। गुजरात इस क्षेत्र में 3.3 प्रतिशत की औसत विकास दर के साथ शीर्ष पर है। उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु की यह विकास दर 3.3 प्रतिशत है। कुछ नेता ऐसा दावा कर रहे हैं कि गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ है, लेकिन उनकी बातें झूठी हैं। इकोनामिक टाइम्स ने आंकड़ो का विस्तृत परीक्षण करके यह बताया है कि सामाजिक क्षेत्र में भी राज्य का प्रदर्शन संतोषजनक है। यह विमर्श कि यह मॉडल दूसरे राज्यों के लिए अच्छा नहीं है और इसे हर जगह नहीं लागू किया जा सकता, पूरी तरह मिथ्या है। मानवतावाद, सुशासन और आर्थिक सुधार गुजरात के सबक हैं। पूरे भारत में इसका अनुगमन किया जाना चाहिए। हमें सभी पार्टियों द्वारा समर्थित रेवड़ी बांटने के दृष्टिकोण को छोड़कर नरेंद्र मोदी के अपेक्षाकृत सकारात्मक विकास मॉडल को स्वीकार करना होगा।
आनी में निकली परशुराम की झांकी
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आनी में निकली परशुराम की झांकी
आनी — दो दिवसीय भगवान परश्ुराम जयंती समारोह का आयोजन किया गया। गुरुवार को दुर्गा माता मंदिर से मुख्य बाजार नए बस स्टैंड तक भगवान परशुराम की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। परशुराम की सुंदर झांकी, जिसमें ब्राह्मण समुदाय की महिलाएं अपने पौरणिक वेशभूषा में शामिल हुईं। भजन कीर्तन के साथ हर गांव से आए ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। दुर्गा माता मंदिर में दो दिनों तक महिला मंडल थवोली, बटाला, ओलवा, पावी, शमेशा, ठोगी, देहुरी, रिवाडी की महिलाओं ने रात्रि भजन संध्या में हिमाचली पहाड़ी भजन गीत, शिवरात्रि गीत, दलागी,भगवान परशुराम शिव, श्रीराम, कृष्ण के भजनों से आनी क्षेत्र को भक्तिमय किया। जिला स्तरीय परशुराम जयंती समारोह में मुख्यातिथि स्वतंत्र कुमार शर्मा अध्यक्ष बार एसोसिएशन आनी ने कहा कि ब्राह्मण इस सृष्टि गुरु कहलाता है। ब्राह्मण को जानने वाला ब्राह्मण कहलाता है। हर गरीब असहाय की सहायता व जीवन जीने की सही दिशा ब्राह्मण ही सिखाता है। स्वतंत्र कुमार शर्मा ने सभा के आयेजन हेतु 3100 रुपए दिए और रात्रि भंडारा भी दिया, जिस पर सभा ने मुख्यातिथि का धन्यवाद किया है। जिला स्तरीय परशुराम जयंती समारोह में विशेष अतिथि शिमला ब्राह्मण सभा के सचिव जीआर भारद्वाज शामिल हुए। श्री भारद्वाज ने जयंती समारेह में शामिल सभी सदस्यों को बताया कि हिमाचल प्रदेश में ब्राह्मण सभा सालों से काम कर रही है। समापन अवसर पर सभा के प्रधान खयाले राम शर्मा, संयोजक अनुपराम शर्मा, उपाध्यक्ष बलविंद्र मोहन शर्मा, श्याम लाल, इंद्र सिंह भारद्वाज, तिलक राज, रूप सिंह भारद्वाज, गोपाल देव, हरिनंद, उमा शंकर दिक्षित, काकू, बीडी शर्मा, महिला मंडल की प्रधान पिंगला, पार्वती शर्मा, भोवन देव, लाल सिंह, देश राज व चमन आदि सदस्य शामिल हुए।
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