एमपीडब्ल्यू अभ्यर्थियों को आठ साल से नौकरी नहीं
आनी — सरकार के निर्देशानुसार स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रदेश विश्वविद्यालय के माध्यम से बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के 600 पदों के लिए वर्ष 2004 में ली गई लिखित परीक्षा और वर्ष 2005 में ली गई मौखिक परीक्षा के चयनित अभ्यर्थी पिछले आठ वर्ष से अपने रोजगार की बाट जो रहे हैं, जबकि पूर्व में ही कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ली गई इस परीक्षा का अभी तक कोई भी निर्णय न होने से प्रदेश भर के स्वास्थ्य केंद्रों में जहां बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हैं, वहीं परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके अभ्यर्थी रोजगार के नाम पर पिछले आठ साल से मानसिक परेशानी झेल रहे हैं। एमपीडब्ल्यू चयनित अभ्यर्थी संघ इकाई आनी के संतोष, चंद्रकेश, पुरुषोत्तम, छविंद्र ,रीना, दीपा, रंजना, अनीता, प्रेम, पुरुषोत्तम, बालकृष्ण, रमेश व चमन आदि का कहना है कि रोजगार के नाम पर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। संघ के सचिव राजकुमार ने बताया कि इस बारे में आनी एमपीडब्ल्यू चयनित अभ्यर्थी संघ की एक आपात बैठक 23 फरवरी को विश्राम गृह आनी में रखी गई है, जिसमें संघ की ओर से एक मांग पत्र प्रदेश सरकार को भेजा जाएगा॒
बड़े सम्मेलनों में छोटा पड़ा हिमाचल
राष्ट्रपति आगमन की एक मुनादी के आगे हिमाचल की सड़कें कांप उठती हैं और हम अपनी व्यवस्था की बचकानी अदा पर तरस खाते हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालय के शाहपुर स्थित अस्थायी परिसर का दीक्षांत समारोह कितना भी भव्य रहे, लेकिन इसके सामने प्रदेश की परिवहन प्रणाली कसूरवार बन गई। उस दिन जिन लोगों ने गगल से शाहपुर के बीच ट्रैफिक नियंत्रण की वीवीआईपी प्रणाली का अनुभव लिया होगा, उनके लिए ऐसी शानो-शौकत का अर्थ कष्टप्रद है। सवाल यह कि हिमाचल में ऐसे आयोजनों की जमीन अकसर कमजोरियों से भर जाती है। कांगड़ा, कुल्लू या शिमला के हवाई अड्डों के बाहर मुसाफिरों के मजमून तकलीफदेह हो जाते हैं। बेशक हम राष्ट्रपति महोदय के सामने सड़क की व्यस्तता पर चंद घंटों के लिए ताला लगा पाए, लेकिन आम नागरिक की दुश्वारियां लगातार नजरअंदाज होती रही हैं। किसी भी सरकार ने हिमाचल में सम्मेलनों, वीआईपी कार्यक्रमों, चुनावी रैलियों, व्यावसायिक व सांस्कृतिक मेलों, संत समारोहों या बड़े कार्यक्रमों के लिए माकूल अधोसंरचना के बारे में विचार नहीं किया। आईपीएल के दौरान आवश्यक कसरत के कारण थोड़ा बहुत प्रयास धर्मशाला की शहरी परिवहन को सुनियोजित करने का हुआ, वरना राजधानी शिमला में भी भीड़ को बांटने के लिए न सड़कों का नेटवर्क है और न ही नए सामुदायिक मैदान विकसित हुए। हमीरपुर शहर में गांधी चौक पर प्रदर्शनों व रैलियों से माहौल की उत्तेजना जायज नहीं है, फिर भी कोई ऐसा मैदान नहीं बनाया गया, जहां सम्मेलनों, रैलियों या व्यापारिक मेलों का आयोजन हो सके। मंडी में सेरी मंच और पड्डल मैदान के बीच शिवरात्रि की धूम से अस्त-व्यस्त होती गलियां देखी जा सकती हैं, तो चंबा में मिंजर मेले का वर्तमान स्वरूप अब चौगान को रास नहीं आ रहा है। ऐसे में मजबूरन खेल मैदानों की घास को तबाह करते सम्मेलन आयोजित होते हैं। धर्मशाला पुलिस मैदान की किस्मत में कब तक किसी व्यापारिक मेले की कीलें चुभेंगी या शिमला का रिज ही समर फेस्टिवल का एकमात्र सहारा बना रहेगा। शहरी विकास मंत्रालय के हर शहर को बढ़ती व्यस्तता, ऐश्वर्य, सामुदायिक-सांस्कृतिक व व्यापारिक जरूरतों, बड़े सम्मेलनों तथा वीआईपी आगमनों के दृष्टिगत देखना पड़ेगा, ताकि शहरी ट्रैफिक प्रबंधन के अनुरूप अधोसंरचना का विकास हो। हमारा मानना है कि हर शहर के चारों छोर पर सामुदायिक मैदान विकसित करके इन्हें जनोपयोगी बनाया जाए। इसके अलावा शहरी भीड़ से कुछ कार्यालयों के परिसर अन्यत्र विकसित किए जाएं। हर शहर में आगमन व निकासी के आधार पर परिवहन ढांचा विकसित ही करना पड़ेगा। कुछ दिन पहले सुजानपुर में नरेंद्र मोदी की रैली में भाजपा ने भीड़ तो एकत्रित कर ली, मगर सड़क ढांचा बुरी तरह बिखर गया। मैदान का प्रवेश अति संकरा साबित हुआ और समस्त रास्ते घंटों जाम हो गए। बेशक सुजानपुर का मैदान प्रदेश में सबसे बड़ा व आकर्षक है, लेकिन आज तक किसी विधायक ने ऐेसी क्षमता को सुसज्जित करती सड़क अधोसंरचना से नहीं जोड़ा। लोगों की भीड़ का आगमन और प्रस्थान ने जहां सुजानपुर के रास्तों का दर्द पहचाना, वहीं करीब सात-आठ हजार वाहनों की पार्किंग प्रशासन को नाखून चबाने पर मजबूर करती रही। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि प्रदेश में न तो वीआईपी आएं और न ही सुजानपुर जैसी महारैली का सोचा जाए। राधास्वामी सत्संग संस्थान इस दिशा में प्रदेश स्तरीय ढांचा मजबूत करके अगर धार्मिक सम्मेलनों की शृंखला खड़ी कर सकता है, तो यह सरकारी तौर पर संभव है। मिशन के परौर स्थित आश्रम में हर साल दो से तीन लाख श्रद्धालु एक दिन के लिए एकत्रित होते हैं और इसी तजुर्बे से वह अपनी अधोसंरचना का विकास कर रहे हैं। विडंबना यह है कि हिमाचली योजनाएं अपने मूल प्रश्नों से बेखबर एक ढर्रा बन गई हैं। अगर कुल्लू दशहरे को व्यापक आकार देना है, तो इसके मुताबिक वहां ढांचागत सुविधाएं जुटानी पड़ेंगी। हर शहर की क्षमता, सभा-सम्मेलन और वीआईपी गहमागहमी के अनुरूप शहरी विकास योजनाओं का प्रारूप तैयार करना जहां जरूरी है, वहीं प्रमुख मार्गों की यातायात क्षमता को नए सिरे से खंगालना होगा। हैरानी यह कि राष्ट्रपति के शाहपुर आगमन से गगल का पुल चीखता रहा, लेकिन हम वीआईपी दौरे के बाद ये जख्म भूल जाएंगे
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